नरसिंहगढ़ में भारतीय ज्ञानपरंपरा पर नेशनल सेमिनार:एसडीएम बोले- भारतीय परंपराओं से जुड़कर संस्कारवान और शोधोन्मुख बनें युवा

राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ स्थित शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार "भारतीय ज्ञानपरंपरा: विज्ञान, संस्कृति एवं दर्शन का समन्वय" बुधवार को संपन्न हुआ। इस सेमिनार में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहलुओं पर गहन चर्चा की। यह आयोजन नरसिंहगढ़ को राष्ट्रीय अकादमिक विमर्श के केंद्र में ले आया। सेमिनार का उद्घाटन विधायक मोहन शर्मा के मुख्य आतिथ्य में हुआ। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल के कुलगुरु डॉ. एस.के. जैन और अनुविभागीय अधिकारी एवं जनभागीदारी अध्यक्ष सुशील कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती पूजन और अतिथियों के तुलसी पौधों से सम्मान के साथ हुआ। छात्राओं कृतिका और तनिषा के समूह ने सरस्वती वंदना और स्वागत गीत प्रस्तुत किया। विधायक बोले- भारतीय संस्कृति और दर्शन हमारी बौद्धिक पहचान मुख्य अतिथि विधायक मोहन शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति और दर्शन हमारी बौद्धिक पहचान की नींव हैं, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। कुलगुरु डॉ. एस.के. जैन ने भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान, दर्शन और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन ज्ञान आज भी वैश्विक संदर्भों में प्रासंगिक है। एसडीएम सुशील कुमार ने युवाओं को भारतीय परंपराओं से जुड़कर संस्कारवान और शोधोन्मुख बनने का संदेश दिया। सेमिनार के शैक्षणिक सत्रों में विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए गए। शैक्षणिक सत्र में डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने वैदिक कालीन भारतीय दर्शन की गहराई और उसकी आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता पर व्याख्यान दिया। एमिटी यूनिवर्सिटी, कोलकाता के डॉ. रमाकांत भारद्वाज ने वैदिक गणित की वैज्ञानिकता और उसके व्यावहारिक महत्व को समझाया। महाराष्ट्र से आए डॉ. देवीदास कल्लापा बामणे ने भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी भाषा के महत्व पर व्याख्यान दिया। दूसरे दिन शोधपत्र वाचन और छात्र प्रदर्शनी सेमिनार के दूसरे दिन तकनीकी सत्र आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। शासकीय महाविद्यालय सारंगपुर के डॉ. फारूक पठान, श्री हरीश मिश्रा, एक्सीलेंस कॉलेज भोपाल की कु. खुशी गुप्ता सहित अन्य प्रतिभागियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए। विद्यार्थियों द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें भारतीय परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को मॉडल और चार्ट के माध्यम से दर्शाया गया। युवाओं को जड़ों से जोड़ने का प्रयास महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. चेतन कुमार त्रिपाठी ने कहा कि इस तरह के राष्ट्रीय आयोजन छोटे शहरों में बौद्धिक माहौल तैयार करते हैं और विद्यार्थियों को शोध की दिशा देते हैं। सेमिनार संयोजक डॉ. सुनीता गुप्ता ने बताया कि आयोजन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों को समकालीन संदर्भों में समझना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय सेमिनार ने यह संदेश दिया कि भारतीय ज्ञानपरंपरा केवल इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि विज्ञान, संस्कृति और दर्शन के समन्वय से भविष्य की दिशा तय करने की क्षमता भी रखती है।

नरसिंहगढ़ में भारतीय ज्ञानपरंपरा पर नेशनल सेमिनार:एसडीएम बोले- भारतीय परंपराओं से जुड़कर संस्कारवान और शोधोन्मुख बनें युवा
राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ स्थित शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार "भारतीय ज्ञानपरंपरा: विज्ञान, संस्कृति एवं दर्शन का समन्वय" बुधवार को संपन्न हुआ। इस सेमिनार में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहलुओं पर गहन चर्चा की। यह आयोजन नरसिंहगढ़ को राष्ट्रीय अकादमिक विमर्श के केंद्र में ले आया। सेमिनार का उद्घाटन विधायक मोहन शर्मा के मुख्य आतिथ्य में हुआ। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल के कुलगुरु डॉ. एस.के. जैन और अनुविभागीय अधिकारी एवं जनभागीदारी अध्यक्ष सुशील कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती पूजन और अतिथियों के तुलसी पौधों से सम्मान के साथ हुआ। छात्राओं कृतिका और तनिषा के समूह ने सरस्वती वंदना और स्वागत गीत प्रस्तुत किया। विधायक बोले- भारतीय संस्कृति और दर्शन हमारी बौद्धिक पहचान मुख्य अतिथि विधायक मोहन शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति और दर्शन हमारी बौद्धिक पहचान की नींव हैं, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। कुलगुरु डॉ. एस.के. जैन ने भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान, दर्शन और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन ज्ञान आज भी वैश्विक संदर्भों में प्रासंगिक है। एसडीएम सुशील कुमार ने युवाओं को भारतीय परंपराओं से जुड़कर संस्कारवान और शोधोन्मुख बनने का संदेश दिया। सेमिनार के शैक्षणिक सत्रों में विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए गए। शैक्षणिक सत्र में डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने वैदिक कालीन भारतीय दर्शन की गहराई और उसकी आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता पर व्याख्यान दिया। एमिटी यूनिवर्सिटी, कोलकाता के डॉ. रमाकांत भारद्वाज ने वैदिक गणित की वैज्ञानिकता और उसके व्यावहारिक महत्व को समझाया। महाराष्ट्र से आए डॉ. देवीदास कल्लापा बामणे ने भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी भाषा के महत्व पर व्याख्यान दिया। दूसरे दिन शोधपत्र वाचन और छात्र प्रदर्शनी सेमिनार के दूसरे दिन तकनीकी सत्र आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। शासकीय महाविद्यालय सारंगपुर के डॉ. फारूक पठान, श्री हरीश मिश्रा, एक्सीलेंस कॉलेज भोपाल की कु. खुशी गुप्ता सहित अन्य प्रतिभागियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए। विद्यार्थियों द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें भारतीय परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को मॉडल और चार्ट के माध्यम से दर्शाया गया। युवाओं को जड़ों से जोड़ने का प्रयास महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. चेतन कुमार त्रिपाठी ने कहा कि इस तरह के राष्ट्रीय आयोजन छोटे शहरों में बौद्धिक माहौल तैयार करते हैं और विद्यार्थियों को शोध की दिशा देते हैं। सेमिनार संयोजक डॉ. सुनीता गुप्ता ने बताया कि आयोजन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों को समकालीन संदर्भों में समझना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय सेमिनार ने यह संदेश दिया कि भारतीय ज्ञानपरंपरा केवल इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि विज्ञान, संस्कृति और दर्शन के समन्वय से भविष्य की दिशा तय करने की क्षमता भी रखती है।