Bone Ossification test क्या है? बाबा सिद्दीकी की हत्या के एक आरोपी का क्यों कराया गया यह टेस्ट

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या मामले में एक आरोपी की उम्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। धरमराज कश्यप नाम के आरोपी का कहना है कि वह 17 साल का है, जबकि अभियोजकों का दावा है कि उसके आधार कार्ड के अनुसार वह 19 साल का है। इस विवाद को सुलझाने के लिए अदालत ने रविवार को कश्यप का बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (bone ossification test) कराने का आदेश दिया है। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट में उसके बालिग होने की पुष्टि हो गई है। ऐसे में अब धर्मराज को पुलिस मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश करेगी और कस्टडी या रिमांड की मांग करेगी। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट एक मेडिकल प्रक्रिया है जिसके द्वारा हड्डियों की परिपक्वता का आकलन करके व्यक्ति की उम्र का अनुमान लगाया जाता है। इस टेस्ट में हाथों और कलाइयों की एक्स-रे तस्वीरों का विश्लेषण किया जाता है ताकि ग्रोथ प्लेट्स के विकास और फ्यूजन का पता लगाया जा सके। बच्चों और किशोरों में, ऑसिफिकेशन हड्डियों के बढ़ने को प्रगति को दर्शाता है, क्योंकि कुछ हड्डियां विशिष्ट उम्र में सख्त हो जाती हैं। चलिए इस टेस्ट के बारे में विस्तार से जानते हैं। बोन ऑसिफिकेशन टेस्टएक मेडिकल प्रोसीजर है, जो हड्डियों के आधार पर उम्र का पता करती है। इस परीक्षण में कुछ विशेष हड्डियों जैसे कि कॉलर बोन (क्लेविकल), छाती (स्टीरनम), और श्रोणि (पेल्विस) की एक्स-रे ली जाती हैं। इन हड्डियों की संरचना में उम्र के साथ बदलाव होते हैं, जिससे उम्र का अनुमान लगाया जाता है। हालांकि इस पद्धति का उपयोग अदालतों में किया जाता है। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट को एपिफिसियल फ्यूजन टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस टेस्ट में शरीर की कुछ हड्डियों, खास तौर पर क्लेविकल, स्टर्नम और पेल्विस की एक्स-रे जांच करके ऑसिफिकेशन की डिग्री निर्धारित की जाती है।ऑसिफिकेशन हड्डियों के बनने की प्रक्रिया है। यह टेस्ट जोड़ों के जुड़ने के आधार पर किया जाता है, जो जन्म से 25 वर्ष तक के बीच होता है, हालांकि यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। यह टेस्ट किसी मामले में आरोपी या पीड़ित की घटना के दिन की उम्र का निर्धारण करने के लिए किया जाता है। खासकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में यह टेस्ट महत्वपूर्ण होता है। यह टेस्ट पूरी तरह सटीक नहीं है। इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सटीक आयु निर्धारण के लिए नहीं माना जाता, क्योंकि व्यक्ति के विकास दर, हड्डियों की संरचना और अन्य व्यक्तिगत कारक इस टेस्ट की सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट भी इसे पूरी तरह से सटीक मानने के बजाय इसे एक अनुमानित प्रक्रिया के रूप में देखती है, खासकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में।

Bone Ossification test क्या है? बाबा सिद्दीकी की हत्या के एक आरोपी का क्यों कराया गया यह टेस्ट
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या मामले में एक आरोपी की उम्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। धरमराज कश्यप नाम के आरोपी का कहना है कि वह 17 साल का है, जबकि अभियोजकों का दावा है कि उसके आधार कार्ड के अनुसार वह 19 साल का है। इस विवाद को सुलझाने के लिए अदालत ने रविवार को कश्यप का बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (bone ossification test) कराने का आदेश दिया है। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट में उसके बालिग होने की पुष्टि हो गई है। ऐसे में अब धर्मराज को पुलिस मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश करेगी और कस्टडी या रिमांड की मांग करेगी। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट एक मेडिकल प्रक्रिया है जिसके द्वारा हड्डियों की परिपक्वता का आकलन करके व्यक्ति की उम्र का अनुमान लगाया जाता है। इस टेस्ट में हाथों और कलाइयों की एक्स-रे तस्वीरों का विश्लेषण किया जाता है ताकि ग्रोथ प्लेट्स के विकास और फ्यूजन का पता लगाया जा सके। बच्चों और किशोरों में, ऑसिफिकेशन हड्डियों के बढ़ने को प्रगति को दर्शाता है, क्योंकि कुछ हड्डियां विशिष्ट उम्र में सख्त हो जाती हैं। चलिए इस टेस्ट के बारे में विस्तार से जानते हैं। बोन ऑसिफिकेशन टेस्टएक मेडिकल प्रोसीजर है, जो हड्डियों के आधार पर उम्र का पता करती है। इस परीक्षण में कुछ विशेष हड्डियों जैसे कि कॉलर बोन (क्लेविकल), छाती (स्टीरनम), और श्रोणि (पेल्विस) की एक्स-रे ली जाती हैं। इन हड्डियों की संरचना में उम्र के साथ बदलाव होते हैं, जिससे उम्र का अनुमान लगाया जाता है। हालांकि इस पद्धति का उपयोग अदालतों में किया जाता है। बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट को एपिफिसियल फ्यूजन टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस टेस्ट में शरीर की कुछ हड्डियों, खास तौर पर क्लेविकल, स्टर्नम और पेल्विस की एक्स-रे जांच करके ऑसिफिकेशन की डिग्री निर्धारित की जाती है।ऑसिफिकेशन हड्डियों के बनने की प्रक्रिया है। यह टेस्ट जोड़ों के जुड़ने के आधार पर किया जाता है, जो जन्म से 25 वर्ष तक के बीच होता है, हालांकि यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। यह टेस्ट किसी मामले में आरोपी या पीड़ित की घटना के दिन की उम्र का निर्धारण करने के लिए किया जाता है। खासकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में यह टेस्ट महत्वपूर्ण होता है। यह टेस्ट पूरी तरह सटीक नहीं है। इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सटीक आयु निर्धारण के लिए नहीं माना जाता, क्योंकि व्यक्ति के विकास दर, हड्डियों की संरचना और अन्य व्यक्तिगत कारक इस टेस्ट की सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट भी इसे पूरी तरह से सटीक मानने के बजाय इसे एक अनुमानित प्रक्रिया के रूप में देखती है, खासकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में।