शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:दूसरों के दु:ख से यदि किसी का हृदय न पिघले तो वह मानव नहीं दानव है- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज
शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:दूसरों के दु:ख से यदि किसी का हृदय न पिघले तो वह मानव नहीं दानव है- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥... तुलसीदासजी कहते हैं कि संतों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान होता है। मक्खन तो गर्मी से पिघलता है, परंतु संतों का हृदय दूसरों के दु:ख से पिघल जाता है। दूसरों के दु:ख से यदि किसी का हृदय न पिघले तो वह मानव नहीं दानव है। मानवता से ही दानवता पर विजय पाई जाती है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में मंगलवार को यह बात कही।
मानवता ने पाई दानवता पर विजय महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- कलकत्ता के उड़ीया बाजार में एक समय अत्यधिक गंदगी होने से महामारी फैल गई। बहुत लोग प्लेग की चपेट में आ गए। तब बापूपाड़ा ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जो इस रोग से अछूता था। वहां के बच्चों न एक सेवादल तैयार किया। 12 वर्षीय छात्र उसका नेता बना। यह दल बीमारी वाले इलाके में घूम-घूमकर रोगियों का सेवा करना, दवा देना आदि किया करता था, पर उड़िया मोहल्ले में ही एक खूंखार अपराधी रहता था। उसने कई बार जेल की सजा काटी थी। बापूपाड़ा में रहने वाले वकीलों के कारण ही उसे सजा मिली थी, जिसके कारण वह उस मोहल्ले से चिढ़ता था। बापूपाड़ा के बच्चों को वह अपने मोहल्ले में नहीं आने देता था। सेवादल का एक बच्चा जो नेता था, वह उस खूंखार ने नहीं डरा और वह उड़िया बाजार में सेवा करने जाता रहा। तभी अचानक उस अपराधी के परिवार के लोग महामारी की चपेट में आ गए। वह अनेक जगह सहायता मांगने गया, पर किसी ने उसकी सहायता नहीं की। निराश होकर जब वह घर लौटा तो देखा कि बापूपाड़ा के जिन बच्चों को वह भगाता रहा, वे बच्चे ही उसके परिवार वालों की सेवा कर रहे हैं और दवा दे रहे हैं। यह देखकर अपराधी का हृदय पिघल गया। मानवता ने दानवता पर विजय पाई। वह बच्चों के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा। बच्चों ने सहज की कह दिया- आपका कोई अपराध नहीं है, जो हम आपको क्षमा करें। आप हमारे पिता की उम्र के हैं, इसलिए हमें आशीर्वाद पाने का अधिकार है, क्षमा करने का नहीं। अपराधी की सारी कटुता समाप्त हो गई। यह बालक ही भारत के महान नेता सुभाषचंद्र बोस के नाम से विश्व विख्यात हुआ।
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥... तुलसीदासजी कहते हैं कि संतों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान होता है। मक्खन तो गर्मी से पिघलता है, परंतु संतों का हृदय दूसरों के दु:ख से पिघल जाता है। दूसरों के दु:ख से यदि किसी का हृदय न पिघले तो वह मानव नहीं दानव है। मानवता से ही दानवता पर विजय पाई जाती है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में मंगलवार को यह बात कही।
मानवता ने पाई दानवता पर विजय महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- कलकत्ता के उड़ीया बाजार में एक समय अत्यधिक गंदगी होने से महामारी फैल गई। बहुत लोग प्लेग की चपेट में आ गए। तब बापूपाड़ा ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जो इस रोग से अछूता था। वहां के बच्चों न एक सेवादल तैयार किया। 12 वर्षीय छात्र उसका नेता बना। यह दल बीमारी वाले इलाके में घूम-घूमकर रोगियों का सेवा करना, दवा देना आदि किया करता था, पर उड़िया मोहल्ले में ही एक खूंखार अपराधी रहता था। उसने कई बार जेल की सजा काटी थी। बापूपाड़ा में रहने वाले वकीलों के कारण ही उसे सजा मिली थी, जिसके कारण वह उस मोहल्ले से चिढ़ता था। बापूपाड़ा के बच्चों को वह अपने मोहल्ले में नहीं आने देता था। सेवादल का एक बच्चा जो नेता था, वह उस खूंखार ने नहीं डरा और वह उड़िया बाजार में सेवा करने जाता रहा। तभी अचानक उस अपराधी के परिवार के लोग महामारी की चपेट में आ गए। वह अनेक जगह सहायता मांगने गया, पर किसी ने उसकी सहायता नहीं की। निराश होकर जब वह घर लौटा तो देखा कि बापूपाड़ा के जिन बच्चों को वह भगाता रहा, वे बच्चे ही उसके परिवार वालों की सेवा कर रहे हैं और दवा दे रहे हैं। यह देखकर अपराधी का हृदय पिघल गया। मानवता ने दानवता पर विजय पाई। वह बच्चों के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा। बच्चों ने सहज की कह दिया- आपका कोई अपराध नहीं है, जो हम आपको क्षमा करें। आप हमारे पिता की उम्र के हैं, इसलिए हमें आशीर्वाद पाने का अधिकार है, क्षमा करने का नहीं। अपराधी की सारी कटुता समाप्त हो गई। यह बालक ही भारत के महान नेता सुभाषचंद्र बोस के नाम से विश्व विख्यात हुआ।